अनजान सफर में मिला हमसफर: पार्ट 2

 Ek romantic kahani Hindi mai

अपने ख्यालों में ही डूबी हुई दीप्ति ने गाड़ी स्टार्ट की और अपने घर की तरफ निकल पड़ी।

जैसे ही वो मार्केट में पहुंची, उसे याद आया कि उसे वहां गांव कि लड़कियों की तरह बन रहना है। उसने गाड़ी रोकी और कुछ सलवार सूट और कुछ घाघरा चोली (उसने अपनी दादी को ये पहने हुए देखा था) खरीदे क्योंकि उसके पास ऐसे कपड़े तो थे नहीं। और फिर घर की तरफ मुड़ी।

घर पहुंचकर उसने टाइम देखा। 12 बज चुके थे और उस भूख भी लग रही थी। उसने तुरंत अपने हाथ पैर धुले और लंच करने बैठ गई ये सोचते हुए की खाने के बाद पैकिंग कर लेगी। लंच करते ही उसने एक एक कर सामान रखना स्टार्ट किया। 

सब सामान रखने के बाद दीप्ति ने अपनी अलमारी खोली तो उसकी नजर वहां रखे एक फोटो फ्रेम पर पड़ गई उसने उस फोटो फ्रेम को उठाकर भीगी पलकों के साथ अपने सीने से लगा लिया 😢 और अतीत के गलियारों में चली गई जब उसके दादा जी ने उसके बहुत जिद करने के बाद उसे ये फोटो दी थी और उसके मां पापा की कहानी भी उसे बताई थी।

दादा जी के बताने के बाद उसे तो यकीन ही नहीं हुआ था कि उसके मां बाप का कत्ल हुआ था। वो भी गांव के सरपंच के हाथ से। दादा जी की आगे की बात ने तो उसे और चौंका दिया था कि सरपंच उसे भी मारना चाहता था। इसीलिए दादा जी ने उसे तुरंत अपनी बहन के यहां शहर भेज दिया था और गांव में ये कह दिया था कि उनकी पोती मर गई है। जिससे सरपंच उस मारने का ख्याल छोड़ दे। उस दिन दीप्ति को पता चला था कि आखिर क्यों उसके दादा जी ने उसकी पहचान बचपन से छिपाई थी और क्यों कभी उसे गांव क्यों नहीं आने देते। जब कभी उनका मन करता वो खुद ही अपनी पोती से मिलने शहर आ जाते थे गांव में ये बोल की बहन की पोती से मिलने जा रहा हूं।

जिस दिन से दीप्ति के दादा जी ने उसे अपने यथार्थ सत्य से मिलवाया था। उसी दिन से वो गुस्से की आग में जल रही थी कि एक पुलिस ऑफिसर होकर भी वो अपने मां बाप की कातिलों को सजा ना दिला पाई। उसने कोशिश तो कई बार की थी लेकिन हर बार उसके दादा जी उसे अपने प्रेम के बंधन में बांध देते और इन सब से दूर रहने तो बोल देते। 

दीप्ति अपने अतीत में ही खोई रहती यदि नेहा कि कॉल नहीं आई होती। फोन बजने से उसका ध्यान टूटा और वो अपने वर्तमान में लौटी। उसने जल्दी से नेहा की कॉल पिक की। थोड़ी देर नेहा से बात करके दीप्ति ने फोन साइड में रखा और अपने हाथ में लिए फ्रेम को देखते हुए बोली – चलिए मां और पापा, आपके कातिलों से रूबरू होने का मौका मिल ही गया। आपकी बेटी आपको इंसाफ दिला के ही रहेगी। इतना कहकर उसने नम आखों के साथ 😢 फोटो वापस अपने जगह पर रख दी। और एक गहरी सांस लेते हुए बेड पर बैठ गई। 

अभी निकालने में 3-4 घंटे का टाइम था तो दीप्ति ने सोचा क्यों ना थोड़ा सो लिया जाए। वैसे भी उसका दिमाग और दिल दोनों बोझिल हो रहे थे। उसने अलार्म सेट किया और सो गई।

अलार्म ने उसे अपने निश्चित समय में जगाया और वो तुरंत उठ कर रेडी होने लगी। उसने अपनी जीन्स और शर्ट उठाई, फिर कुछ सोच कर उसे वापस रख दिया और सलवार सूट लेकर बाथरूम की तरफ चल पड़ी। 

अगले 10 मिनट्स में वो अपने घर से बाहर थी एक नए और अनजान सफर पर निकालने के लिए।,

स्टेशन पहुंचकर दीप्ति ने देखा ट्रेन राइट टाइम थी। उसने राहत की सांस ली। और निकल पड़ी अपनी मंजिल की ओर पूरी शिद्दत के साथ।

 ठंडी ठंडी हवाओं ने सुबह 6 बजे दीप्ति का स्वागत पन्ना में किया। उसने मैप निकाला और देखा कि उसे 2 बस पकड़नी है अपने मंजिल तक पहुंचने के लिए। पहली बस तो किसी भी वक़्त मिल सकती है लेकिन दूसरी बस को पकड़ने के लिए 10 बजे उस बस स्टॉप पर  हर हाल में पहुंचना होगा। ये सोचते हुए दीप्ति 

बिना एक पल गवाएं बस स्टॉप की तरफ निकल पड़ी और उसे बस भी तुरंत मिल गई।

 बस का सफर 3 घंटे का था और फिर करीब 1 किलो मीटर पैदल चलना था दूसरी बस पड़ने के लिए। रास्ते में बस ने थोड़ा ज्यादा समय ले लिया, फिर भी 9:30 बजे दीप्ति बस से उतर चुकी थी।

बस से उतर कर उसने इधर उधर नज़र दौड़ाई और वहां का एरिया देखकर दंग रह गई। शहर से कोसों दूर, नितांत सन्नाटा पसरा हुआ था यहां।  दूर दूर से कोई भी आता जाता नहीं दिखाई पड़ रहा था। 

‘ कितना जंगली एरिया है। ‘ दीप्ति मन में सोचते हुए और थोड़ा  सावधान होते हुए आगे चल पड़ी। उसे यहां से थोड़ा दूर पैदल चलना था। 

चूंकि उसे 10 बजे हर हाल में बस स्टॉप पर पहुंचना था, वो तेज क़दमों से चलने लगी। अभी दीप्ति कुछ कदम ही चली थी कि उसे किसी की आहत सुनाई दी। 👣 उसने पलट कर देखा, कोई नहीं था। दीप्ति को हेड ऑफिसर  सर की गुंडों से सावधान रहने वाली बात याद  आ गयी और वो थोड़ा और चौक्कना होते  हुए आगे चल पड़ी।  

उसने अभी दो कदम भी नहीं बढ़ाएं थे कि दो नकाबपोश आदमी उसके सामने कूद पड़े। और दो पीछे से आ गए। ,

दीप्ति ने उन्हें बड़े ध्यान से देखा और अगले कुछ ही पलो में वो नकाबपोश गुंडे जंगल की तरफ भागते दिखाई पड़े। एक पुलिस आफिसर के लिए भला 2-4 गुंडे कौन सी बड़ी बात है।😎

उनसे दो दो हाथ करने के बाद दीप्ति ने अपने कपड़े सही किए, समान उठाया, और तेज़ कदमों के साथ आगे चलने लगी ये बड़बड़ाते हुए कि एक तो वैसे भी लेट थी और और इन फालतू लोगों ने और लेट करा दी।  दीप्ति की तेज़ी की वजह कोई घबराहट नहीं थी बल्कि बस पड़कने की जल्दी थी। क्योंकि इस मार पीट में उसने अपने 10 मिनट्स गवां दिए थे। 

लगभग 1 किलो मीटर से भी ज्यादा चलने के बाद भी दीप्ति को ना तो कोई बस स्टॉप दिखाई पड़ा और ना ही कोई बस। उसने टाइम देखा, 10:20 हो रहा था। दीप्ति मन में सोचने लगी 🤔 क्या बस निकल गई?? लेकिन ऐसे कैसे हो सकता है 🤔🤔 बस स्टॉप तो मिला ही नहीं अभी तक।

दीप्ति अपने सवालों में ही उलझी हुई थी कि तेज़ रफ्तार से एक गाड़ी आकर उसके सामने रुकी। चूंकि वहां थोड़ा पानी भरा हुआ था, गाड़ी की तेज़ स्पीड होने के कारण पानी उचट कर दीप्ति के कपड़ों पर पड़ गया और वो गुस्से में 😡अपने कपड़ों में पड़े कीचड़  के छीटों  को देखने लगी ।

‘माफ़ कीजियेगा, हमें बिलकुल अंदाज़ा नहीं था कि यहां पानी है ‘ सामने से एक मीठी आवाज़ आई।

दीप्ति, जो अभी भी अपने कपड़ों को ही देख रही थी, गुस्से में अपनी नजरें उठाई तो उसकी नजरें ज्यों की त्यों ठहर गई और उसका गुस्सा एक पल में ही गायब हो गया। 

सामने जीप में एक नवयुवक बैठा हुआ था जो हैरान नज़रों से दीप्ति को ही देख रहा था।😍 उसके चेहरे पे सौम्य मुस्कुराहट थी और आखों में एक अलग ही चमक। उसके काले घुंघराले बाल उसके माथे की सहला रहे थे।

एक पल के लिए वो दोनों अपने आप को भूलकर एक दूसरी की आखों में खो गए।

 

अगला पार्ट जल्द ही

पहला पार्ट यहाँ पढ़े : अनजान सफर में मिला हमसफर: पार्ट 1 romantic kahani Hindi mai

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